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कैलाश मानसरोवर यात्रा पर टकराएंगे भारत-नेपाल? तनाव की वजहें समझिए


उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर नेपाल ने एक बार फिर अपना कड़ा विरोध जताया है। नेपाल सरकार का कहना है कि यह रास्ता उनके इलाके से होकर निकलता है जिस पर भारत अपना हक जताता है। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि इस यात्रा मार्ग को चलाने या वहां कोई भी काम करने से पहले उनसे कोई सलाह नहीं ली गई। नेपाल 1816 की सुगौली संधि का हवाला देते हुए लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को अपना हिस्सा मानता है। उनका कहना है कि महाकाली नदी के पूर्व का पूरा क्षेत्र उनके नक्शे में आता है और यह उनके देश का जरूरी हिस्सा है।

 

नेपाल ने इस मामले में सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि चीन को भी मैसेज भेजकर अपनी आपत्ति जताई है। नेपाल के विदेश मंत्रालय के मुताबिक उन्होंने डिप्लोमैटिक चैनलों के जरिए दोनों देशों को बता दिया है कि लिपुलेख क्षेत्र पर नेपाल का अधिकार है। नेपाल का कहना है कि उसने पहले भी भारत से कहा था कि इस इलाके में सड़क बनाने या तीर्थ यात्रा जैसा कोई भी काम न किया जाए। हालांकि, विरोध के साथ ही नेपाल ने यह भी कहा है कि वह भारत के साथ अपनी दोस्ती को खराब नहीं करना चाहता और सीमा से जुड़े इस झगड़े को बातचीत के जरिए शांति से सुलझाना चाहता है।

 

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भारत ने नेपाल के दावों को झूठा बताया

भारतीय विदेश मंत्रालय ने नेपाल की इन बातों का बहुत सीधा जवाब दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साफ किया कि इस मुद्दे पर भारत का स्टैंड हमेशा से एक जैसा रहा है। भारत का कहना है कि लिपुलेख दर्रे का इस्तेमाल कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए साल 1954 से हो रहा है इसलिए इसमें कुछ भी नया नहीं है। भारत ने नेपाल के दावों को बनावटी बताया है। भारत का मानना है कि नेपाल की बातें किसी भी पुराने सच या सबूत पर आधारित नहीं हैं इसलिए इन्हें माना नहीं जा सकता।

 

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यात्रा की तैयारी

कैलाश मानसरोवर यात्रा को बहुत पवित्र माना जाता है जिसे भारत और चीन की सरकार मिलकर करवाती है। साल 2026 की यह यात्रा जून से अगस्त के बीच होने वाली है। चीन ने पिछले साल ही इस यात्रा को दोबारा शुरू करने की इजाजत दी थी। अब नेपाल के इस नए विरोध ने सीमा पर एक बार फिर चर्चा छेड़ दी है। भारत ने हालांकि साफ कर दिया है कि वह बातचीत के लिए तैयार है लेकिन अपनी जमीन और अधिकारों के मामले में कोई ढील नहीं देगा।

असम और बंगाल में BJP की प्रचंड जीत, तमिलनाडु में विजय सत्ता के करीब


पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को तीन प्रदेशों में सत्ता में आने का मौका मिला। असम में लगातार तीसरी बार बीजेपी की वापसी हुई है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मस्थली बंगाल में बीजेपी आजादी के बाद पहली बार सत्ता तक पहुंची है। केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में भी जनता ने एनडीए के पक्ष में फैसला सुनाया। केरल में पिछले एक दशक से चली आ रही लेफ्ट की सत्ता का अंत हो गया है। यहां कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ ने बहुमत हासिल किया है। तमिलनाडु में सबसे बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। यहां अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी ने सबसे बड़ी जीत हासिल की है। 

बंगाल में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत

पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने ऐतिहासिक जीत हासिल की। सोमवार रात साढ़े नौ बजे तक पार्टी 174 सीटों पर जीत दर्ज कर चुकी थी। 34 सीटों पर आगे चल रही थी। टीएमसी 59 सीटों पर जीती और 20 पर आगे थी। कांग्रेस और हुमायूं कबीर की पार्टी ने दो-दो सीटों पर बाजी मारी। सीपीएम और एआईएसएफ को एक-एक सीट पर जीत मिली।

 

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भवानीपुर सीट पर बीजेपी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने सुवेंदु अधिकारी को उतारा था। कांटे की टक्कर में सुवेंदु ने ममता बनर्जी को पांच साल में दूसरी बार सियासी शिकस्त दी। 2021 में भी सुवेंदु ने ममता बनर्जी को नंदीग्राम विधानसभा से चुनाव हरा चुके हैं। 

असम: लगातार तीसरी बार बीजेपी सत्ता में

असम विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने हिमंता बिस्वा सरमा की अगुवाई में लगातार तीसरी बार जीत हासिल की। इस बार पार्टी का प्रदर्शन पिछले चुनाव से भी बेहतरीन रहा। 2021 में जहां बीजेपी को 60 सीटों पर जीत मिली थी। वहीं अबकी बार 81 सीटों पर जीत हासिल की। देर रात तक एक सीट पर बढ़त बना रखी थी। 

 

कांग्रेस ने 18 सीटों पर कब्जा जमाया और एक पर बढ़त हासिल की। 2021 में कांग्रेस ने असम में 26 सीटें जीती थी। बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट और असम गण परिषद को 10-10 सीटों पर सफलता मिली। एआईयूडीएफ और रायजोर दल ने दो-दो सीटों पर बाजी मारी। तृणमूल कांग्रेस को एक सीट पर जीत मिली। 

 

कांग्रेस के सीएम चेहरा और मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई अपनी सीट भी नहीं बचा सके। उन्हें जोरहाट विधानसभा सीट पर बीजेपी प्रत्याशी हितेंद्र नाथ गोस्वामी ने 23182 मतों से हराया है। 

तमिलनाडु: पहले चुनाव में विजय ने इतिहास रचा 

अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी टीवीके ने अपने पहले चुनाव में इतिहास रच दिया। उनकी पार्टी को रात साढ़े नौ बजे तक 95 सीटों पर जीत मिल चुकी थी और 12 पर बढ़त बना रखी थी। दो साल पहले गठित विजय की पार्टी की प्रचंड जीत की हर तरफ चर्चा है।  सत्तारुढ़ डीएमके ने 50 सीटों पर जीत हासिल की। 10सीटों पर उसे बढ़त मिली। अंतिम नतीजे आने पर सीटों की संख्या कम या ज्यादा हो सकती है। 

 

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एआईएडीएमके ने 42 सीटों पर जीत और 5 पर बढ़त बना रखी है। कांग्रेस ने चार सीटों पर जीत हासिल की। एक और सीट पर बढ़त बनाई है। पांच अन्य दलों को दो-दो सीटों पर जीत मिली। तीन दलों ने एक-एक सीट पर कब्जा जमाया। विजय की पार्टी का जादू इतना चला कि तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन खुद भी चुनाव हार गए।

केरल में लेफ्ट साफ

यहां लेफ्ट की 10 साल की सत्ता का अंत हो गया। कांग्रेस की अगुवाई में यूडीएफ ने प्रचंड जीत हासिल की। कांग्रेस ने प्रदेश की 140 विधानसभा सीटों में से 63 पर जीत हासिल की। सीपीएम ने 26 सीटों पर कब्जा जमाया है। मुस्लिम लीग के खाते में कुल 22 सीटें आई हैं। हालांकि उसने सिर्फ 27 सीटों पर ही अपने प्रत्याशी उतारे थे। सीपीआई ने आठ, केरल कांग्रेस ने 7, आरएसपी और बीजेपी ने 3-3, चार दलों ने चार-चार और चार ही सीटों पर निर्दलीयों ने जीत हासिल की।

पुडुचेरी में एनडीए सत्ता में

पुडुचेरी की सत्ता में एनडीए की वापसी हो गई है। प्रदेश की कुल 30 विधानसभा सीटों में से 11 पर AINRC ने जीत हासिल की। डीएमके के खाते में पांच सीटें आई हैं। बीजेपी ने चार और विजय की पार्टी टीवीके ने दो सीटों पर कब्जा जमाया है। तीन सीटों पर निर्दलीयों का दबदबा देखने को मिला। कांग्रेस और एडीएमके ने एक-एक सीटों पर जीत हासिल की।

 

गर्मी से बचने के लिए क्या करें, किन चीजों को खाने से बचें? सबकुछ डॉक्टर से जानें


दिल्ली समेत अन्य राज्यों में भीषण गर्मी पड़ रही है। गर्मी की वजह से लोगों का बुरा हाल है। इससे बचने के लिए लोग तमाम तरह के उपाय कर रहे हैं। इस मौस में गर्म हवाएं, उमस, धूप और अधिक तापमान के कारण हीट एग्जॉशन और हीट स्ट्रोक होने का खतरा बढ़ जाता है। खासतौर से लोग बाहर खुले में काम करते हैं। उनके के लिए सबसे ज्यादा परेशानी हैं। सरकार की तरफ से गर्मी से बचने के लिए एडवाइजरी जारी की गई है।

 

हीट स्ट्रोक के खतरे से बचने के लिए क्या करना चाहिए? क्या नहीं करना चाहिए? इसके बारे में आइए दिल्ली के एम्स (AIIMS) अस्पताल के चिकित्सा विभाग के प्रोफेसर और डॉक्टर नवल विक्रम से जानते हैं।

 

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हीट स्ट्रोक से बचने के लिए क्या करें?

 

डॉक्टर नवल विक्रम ने बताया कि हमारे पास वे मरीज भर्ती होते हैं जिनका तापमान 106 से 107 डिग्री तक पहुंच जाता है। उस स्थिति को हाइपरपायरेक्सिया कहा जाता है। 

  • अगर आप बाहर काम कर रहे हैं तो ये लोग हल्के कपड़े पहनें। अपने सिर को ढककर रखें।
  • अगर आपने घंटे या 2 घंटे धूप में काम किया तो थोड़ी देर के लिए छाव में आराम करें। ऐसा करने से शरीर का तापमान थोड़ा सामान्य होगा।
  • थोड़ी-थोड़ी देर पर पानी पीते रहें। पानी पीने का मतलब है कि पसीना आएगा और इससे शरीर का तापमान नियंत्रित रहेगा। अगर आप पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं पीते हैं तो शरीर को पसीना आना कम हो जाता है। पसीना कम आने से त्वचा ड्राई होती है और शरीर का तापमान बढ़ने लगता है। हर एक घंटे में पानी पीते रहिए।
  • अगर हमारे पास हीट स्ट्रोक वाले मरीज आते हैं तो उन्हें हम आईवी फ्लूड या फ्लूड देते हैं ताकि शरीर का तापमान कम हो। दूसरा नाक से पेट में नली डालते हैं क्योंकि उस समय लोग होश में नहीं रहते हैं। उसी नली से हम उन्हें पानी देते हैं ताकि तापमान कम हो। उसके अलावा कोल्ड ब्लैंकेट डालते हैं जो धीरे-धीरे घंटों में तापमान को सामान्य करता है।

खान-पान कैसा रखें?

 

एम्स की चीफ डाइटिशियन डॉक्टर परमीत कौर के मुताबिक इस मौसम में हल्का खाना खाएं। मसाले वाली चीजों को खाने से परहेज करें। अपने खाने के साथ दही, छाछ, पुदीना की चटनी और बेल शरबत लें। ये चीजें आपके पेट के लिए अच्छा होता है।

 

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बहुत अधिक मीठा, नमक और तली भूनी चीजों को खाने से बचना चाहिए। आप शरीर को हाइड्रेटेड रखने के लिए घर में ओआरएस बना सकते हैं।

बच्चों का ध्यान कैसे रखें?

 

बच्चों को पानी पिलाते रहिए। उन्हें वे चीजें पीने के लिए दें जिसमें चीनी की मात्रा कम हो। उन्हें हवादार कमरे में रखें। बाहर की बजाय घर के अंदर की खेलने को कहें। उन्हें हल्के कपड़े पहनाएं। अगर किसी बच्चों को पहले से ही कोई बीमारी है तो उनका ज्यादा ख्याल रखें। 

 

जिन खालिस्तानियों को पाल रहा था कनाडा, उन्हें देश के लिए खतरा क्यों मानने लगा?


कनाडा ने दशकों तक खालिस्तान आंदोलन को हवा दी है। कनाडा की लिबरल पार्टी  खालिस्तान  आंदोलन को लेकर हमेशा से उदार रही है। कनाडा में बैठक कई खालिस्तानी आतंकियों को संरक्षण मिला। भारत की खुफिया एजेंसिया ऐसे आरोप लगाती रही हैं। कनाडा से जस्टिन ट्रुडो की सरकार के विदा होते ही, नई सरकार ने अपना रुख बदल लिया है। अब कनाडा की खुफिया एजेंसियों ने ही ‘खालिस्तान आंदोलन’ को कनाडा की धरती के लिए खतरा बताया है।  

साल 2025 में कनाडियन सिक्योरिटी इंटेलिजेंस सर्विस ने अपने खुफिया रिपोर्ट में दावा किया कि कनाडा बेस्ड खालिस्तानी एक्स्ट्रीमिस्ट (CBKEs) लगातार देश और देश के बाहर विदेश में कनाडा के हितों के लिए खतरा बने हुए हैं। 

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कनाडा की खुफिया रिपोर्ट क्या कह रही है?

कनाडा के खुफिया विभाग ने यह दावा किया है कि खालिस्तानी संगठनों से जुड़े कुछ लोग, कनाडा के आम नागरिकों से फंड जुटाते हैं, उनका दुरुपयोग करते हैं और हिंसक गतिविधियों के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। उन्हें बिना बताए ही उनके दान का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि खालिस्तानी अतिवाद कनाडा की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है।

क्यों खालिस्तान से डरा कनाडा?

खालिस्तानी समूह भारत के अंदर एक अलग देश बनाने की मांग करते हैं। भारत सरकार ने इन्हें आतंकवादी संगठन घोषित किया है। खालिस्तान, अलगाववादी गतिविधियों में शामिल रहे हैं। यह रिपोर्ट एयर इंडिया फ्लाइट 182 के बम विस्फोट की 40वीं बरसी पर आई है। 

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किस हमले के बाद आई है यह रिपोर्ट?

साल 1985 में हुआ यह हमला कनाडा के इतिहास का सबसे घातक आतंकी हमला था, जिसमें 329 लोग मारे गए थे, जिनमें ज्यादातर कनाडाई नागरिक थे। हमले के बाद भारत और कानाडा के संबंध बिगड़ गए थे।

खालिस्तान पर कनाडा का रुख क्या है?

रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि खालिस्तान के लिए शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से समर्थन करना अतिवाद नहीं माना जाता। कई कनाडाई लोग कानूनी और शांतिपूर्ण तरीके से इस मुद्दे पर अभियान चलाते हैं। केवल वे छोटे-से समूह जो कनाडा को आधार बनाकर भारत में हिंसा को बढ़ावा देते हैं, फंड इकट्ठा करते हैं या हिंसक योजनाएं बनाते हैं, उन्हें ही खालिस्तानी अतिवादी माना जाता है।

 

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अब कैसे हैं भारत और कनाडा के संबंध?

जस्टिन ट्रुडो के दौर में भारत और कनाडा के रिश्ते, सबसे खराब में दौर में रहे। साल 2023 में रिश्ते और तल्ख हो गए। तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने खालिस्तानी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत का हाथ होने का आरोप लगाया था। भारत ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया था। प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के नेतृत्व में दोनों देश रिश्तों को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं।

‘दबंग बन गए हैं जज’, तुषार मेहता ने जजों की ‘दादागिरी’ पर उठाए सवाल


सीनियर वकील और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की नई किताब इन दिनों चर्चा में है। उन्होंने अपनी किताब में न्यायपालिका में जजों के व्यवहार पर सवाल उठाते हुए कहा है कि कुछ जजों का रवैया सही नहीं है। उन्होंने किताब में दुनिया भर में वकीलों की तरफ से जजों के लिए जताई जाने वाली श्रद्धा को लेकर कई प्रश्न खड़े किए हैं। उनकी इस किताब ने न्यायिपालिका को लेकर एक बार फिर से बहस तेज कर दी है। 

 

दरअसल, उन्होंने कहा कि अदालतों में जजों को जरूरत से ज्यादा सम्मान देने की परंपरा कभी-कभी उल्टा असर डालती है। इससे कुछ जजों में एक तरह की श्रेष्ठता की भावना आ जाती है और उनका व्यवहार दबाव बनाने वाला हो सकता है। उन्होंने लिखा कि कुछ जजों में दिव्यता का ‘अनूठा एहसास’ पैदा हो गया है। 

 

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कैसे उठा पूरा मामला?

यह पूरी बहस तुषार मेहता की किताब  ‘द बेंच, द बार एंड द बिजार’ से शुरू होती है। इस किताब में तुषार मेहता ने कहा कि कुछ मामलों में जजों का रवैया ऐसा हो जाता है कि वकीलों के लिए अपनी बात रखना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने यह भी इशारा किया कि न्यायपालिका में संतुलन और जवाबदेही बनाए रखना जरूरी है, ताकि सभी पक्षों को बराबर मौका मिल सके। उन्होंने विदेशी अदालतों का जिक्र करते हुए ‘बेंच की दादागिरी’ थीम का जिक्र किया। 

जजों की कार्यशैली पर उठाए सवाल

तुषार मेहता ने कहा है कि न्यायिक दादागिरी कई रूप ले सकती है। कुछ जज वकीलों की बात लगातार काटते हैं, तो कुछ सख्ती की हद पार करके अपमान करने पर उतर आते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका देश की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है और जनता को इससे सर्वोच्च स्तर की निष्पक्षता और मर्यादा की उम्मीद होती है। ऐसे में अगर किसी भी स्तर पर व्यवहार में कमी आती है, तो यह चिंता का विषय बन जाता है।

जजों को सम्मान देने के तरीकों पर सवाल

तुषार मेहता ने अपनी किताब में अदालत के अंदर जजों को सम्मान देने के तरीकों को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि अगर बेंच की ओर से कोई बेतुकी कानूनी बात भी कही जाती है, तो वकील पहले ‘हम माननीय न्यायाधीश के सामने नतमस्तक हैं’ कहकर उसका जवाब देते हैं। इसके बाद वकील कोर्ट में कोई प्रस्ताव पेश करने की हिम्मत कर पाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका देश की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है और जनता को इससे सर्वोच्च स्तर की निष्पक्षता और मर्यादा की उम्मीद होती है। ऐसे में अगर किसी भी स्तर पर व्यवहार में कमी आती है, तो यह चिंता का विषय बन जाता है।

 

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कानूनी जगत में बढ़ी हलचल

यह पहली बार नहीं है जब न्यायपालिका के कामकाज पर सवाल उठे हों। पहले भी कई बार जजों के व्यवहार, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बहस होती रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता के साथ-साथ उसकी जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।  तुषार मेहता एक जाने-माने वकील हैं और उनकी इस किताब के बाद वकीलों और कानूनी विशेषज्ञों के बीच चर्चा तेज हो गई है। कुछ लोग इसे एक जरूरी बहस मान रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि इस तरह की बातें न्यायपालिका की छवि पर असर डाल सकती हैं।

 

15 से 29 साल के लोगों में हार्ट अटैक के मामले बढ़े, जानिए बचाव के तरीके और कारण


भारत में हार्ट अटैक के मामले तेजी से बढ़े हैं। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के मुताबिक दुनियाभर में 10 में से 7 व्यक्ति को हार्ट अटैक आता है। हाल ही में National Statistical Organisation (NSO) का सर्वे आया है जिसमें बताया कि पिछले 7 सालों में भारत में हार्ट अटैक के मामले 3 गुना ज्यादा बढ़े हैं। रिपोर्ट में बताया गया कि 15 से 29 साल के युवाओं में हार्ट अटैक के मामले बढ़े हैं। पहले हृदय संबंधी बीमारियां लोगों को 50 या 60 की उम्र के बाद होती थी।

 

दिल की बीमारी आज के समय में सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्या बन गया है। जितनी उम्र ज्यादा होता है उतना ही ज्यादा हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है। आइए जानते हैं युवाओं में हार्ट अटैक का क्या कारण है और उससे कैसे बच सकते हैं?

 

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उम्र के हिसाब से जानिए हार्ट अटैक का खतरा

  • 0 से 4 साल – 0.3%
  • 5 से 14 साल- 0.2%
  • 15 से 29 साल -2.1%
  • 30 से 44 साल- 15. 31%
  • 45 से 59 साल- 30. 1%
  • 60 साल के ऊपर- 37.8%

सर्वे में पाया गया कि 15 से 29 साल वाले 27% लोग संक्रमण की वजह से अस्पताल में भर्ती हुए हैं। इस उम्र के लोगों में 3. 4 % लोग हृदय संबंधी बीमारियों की वजह से भर्ती हुए हैं जो कि चिंता की बात है। रिपोर्ट में पाया गया कि गांव के मुकाबले शहर में रहने वाले पुरुषों में हार्ट संबंधी बीमारियों के मामले बढ़े हैं।

युवाओं में हृदय संबंधी बीमारी के बढ़ने का कारण क्या है?

शारीरिक गतिविधियों में कमी- ज्यादातर लोग डेस्क जॉब करते हैं और इस वजह से एक ही जगह पर घंटों बैठे रहते हैं। इस वजह से मोटापे बढ़ता है। मोटापा हृदय संबंधी बीमारी को बढ़ाने का काम करता है।

 

बाहर का जंक फूड- आज के समय में लोग घर का खाना कम खाते हैं और बाहर की तली भनी चीजें ज्यादा पसंद करते हैं। इन चीजों में रिफाइंड कार्ब्स और शुगर होता है जो शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने का काम करता है। हाई कोलेस्ट्रॉल आपके हार्ट के लिए खतरनाक है।

 

तनाव- आजकल की इस भागदौड़ वाली जिंदगी में युवा छोटी-छोटी बातों पर तनाव लेते हैं। युवाओं को ऑफिस का प्रेशर, फाइनेंशल प्रेशर और पर्सनल लाइफ से जुड़ी चुनौतियों की वजह से तनाव महसूस होता है। तनाव के कारण कोर्टिसोल और एड्रेनालिन हार्मोन बढ़ता है जो ब्लड प्रेशर को प्रभावित कर सकता है।

 

स्मोकिंग और शराब- आज के समय में स्मोकिंग और शराब पीने को कूल ट्रेंड माना जाता है। ये दोनों चीजें आपके दिल के लिए नुकसानदायक है। स्मोकिंग से ब्लड प्रेशर बढ़ता है और ऑक्सीजन का लेवल कम होता जिसकी वजह हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ता है।

 

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कैसे बचें?

  • संतुलित आहार लें- अपनी डाइट में फल, सब्जियां, साबुत अनाज और ओमेगा 3 वाली चीजों को शामिल करें।
  • रोजाना 30 से 45 मिनट तक एक्सरसाइज करें।
  • 30 साल की उम्र के बाद हर महीने हेल्थ चेकअप करवाएं।
  • शराब, सिगरेट और तंबाकू से पूरी तरह से परहेज करें

उत्तराखंड के 5 प्रयागों का क्या रहस्य है? पौराणिक कहानियों से समझिए


उत्तराखंड को देवों की भूमि माना जाता है, जहां हिन्दू धर्म के कई धार्मिक स्थल हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कई प्राचीन मंदिर जैसे बद्रीनाथ और केदारनाथ की उत्पत्ति यहीं हुई थी। इसके अलावा कुछ पवित्र नदियों की धारा भी यहीं से शुरू हुई, जो आज भी उतनी ही पवित्र और स्वच्छ मानी जाती हैं जितनी पहले हुआ करती थीं। धार्मिक मान्यता के अनुसार जब मां गंगा धरती लोक में सबसे पहले आईं, तो वह भगवान शिव की जटाओं में विराजमान थीं, जिसके बाद वे धरती पर विभिन्न नदियों के प्रवाह से मिल गईं, जिन्हें संगम कहा जाता है। ऐसा ही पांच प्रयाग हैं, जहां गंगा जी अलग-अलग नदियों से मिली हैं।


हिन्दू धर्म में गंगा नदी को सबसे पवित्र माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक उत्तराखंड के पांच प्रयाग केवल एक संगम नहीं हैं, बल्कि कई पौराणिक कहानियों का प्रतीक हैं। उत्तराखंड में जब अलकनंदा नदी पांच अलग-अलग नदियों से मिली, तो पांच पवित्र संगमों का निर्माण हुआ। इन पांच संगमों के नाम हैं विष्णुप्रयाग, नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग और देवप्रयाग। अब सवाल उठता है कि इन पांचों नदियों के संगम की पौराणिक कहानी क्या है।

 

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पंच प्रयाग से जुड़ी पौराणिक कथा


1. विष्णुप्रयाग


विष्णुप्रयाग उत्तराखंड के चमोली जिले में है, जहां चारधाम यात्रा के दौरान भक्त जाते हैं और पूरे श्रद्धा भाव से नदी में डुबकी लगाते हैं। विष्णुप्रयाग में अलकनंदा और धौलीगंगा नदी का संगम है। माना जाता है कि यहां स्नान करने से भक्तों के सारे पाप खत्म हो जाते हैं। इसी वजह से कई श्रद्धालु बद्रीनाथ धाम के दर्शन के बाद यहां डुबकी लगाते हैं।


इस स्थान से जुड़ी पौराणिक कथा यह है कि यहां नारद मुनि ने भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु यहां प्रकट हुए थे। इसी कारण इस संगम को विष्णुप्रयाग कहा जाता है। कई धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु आज भी यहां विराजमान हैं।


2. नंदप्रयाग


नंदप्रयाग में अलकनंदा और नंदाकिनी नदी का संगम देखने को मिलता है। यह भी उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित है। इस स्थान से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार यहां राजा नंद रहते थे, जिनकी कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने भगवान विष्णु की कई सालों तक तपस्या की थी। उनकी तपस्या से खुश होकर भगवान विष्णु ने उन्हें संतान का वरदान दिया। तभी से इस स्थान को नंदप्रयाग कहा जाने लगा।

 

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3. कर्णप्रयाग


कर्णप्रयाग में अलकनंदा और पिंडर नदी का संगम है। इस स्थान की पौराणिक कथा महाभारत से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि महाभारत के वीर कर्ण ने यहां सूर्य देव की कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर सूर्य देव ने उन्हें कवच और कुंडल प्रदान किए थे। इसी कारण इस संगम को कर्णप्रयाग कहा जाता है।


4. रुद्रप्रयाग


रुद्रप्रयाग में अलकनंदा और मंदाकिनी नदी का संगम है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यहां भगवान शिव ने रुद्र रूप धारण किया था। कहा जाता है कि नारद मुनि ने यहां भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी, जिसके बाद शिवजी रुद्र रूप में प्रकट हुए और उन्होंने तांडव नृत्य किया। यह संगम केदारनाथ धाम के पास स्थित है, इसलिए इसका धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।


5. देवप्रयाग


देवप्रयाग उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में स्थित है। यहां अलकनंदा और भागीरथी नदी का संगम होता है, और यहीं से गंगा नदी का वास्तविक स्वरूप शुरू होता है। इस संगम से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार भगवान राम रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद यहां आए थे। उन्होंने यहां भगवान विष्णु के रूप में तपस्या की थी। इसलिए इस स्थान को देवप्रयाग कहा जाता है।

 

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44,447 की गई जान, अमेरिका में बात-बात पर क्यों चल जाती है गोली?


दुनिया में बंदूक हिंसा में सबसे अधिक जानें अमेरिका में जाती हैं। अमेरिका के बाद बंदूक से सबसे अधिक मौतें ब्राजील में होती हैं। 2023 के आंकड़ों के मुताकि अमेरिका में बंदूक हिस्सा में मरने वालों की संख्या ब्राजील की तुलना में 10 हजार अधिक थी। अमेरिका के रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र (CDC) के आंकड़ों के मुताबिक 2024 में अमेरिका में बंदूक हिंसा में 44,447 लोगों की जान गई। पिछले तीन वर्षों से मृतकों की संख्या में गिरावट हुई, लेकिन यह आंकड़ा अब भी बहुत अधिक है।

 

गन वायलेंस आर्काइव के मुताबिक अमेरिका में 2024 में सामूहिक गोलीबारी में 510 लोगों की जान गई। वहीं एफबीआई का डेटा बता रहा है कि साल दर साल सामूहिक गोलीबारी की घटनाओं में कमी आ रही है। मगर बड़ी संख्या में लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ रही है। 2021 में सामूहिक गोलीबारी की 61, 2022 में 50, 2023 में 48 और 2024 में 24 घटनाओं से अमेरिका दहल उठा। 

 

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गोली मारकर खुदकुशी के मामले सबसे अधिक

खास बात यह है कि अमेरिका में बंदूक से होने वाली मौतों में सबसे बड़ी हिस्सेदारी आत्महत्याओं की है। करीब 62 फीसद मामले खुदकुशी से जुड़े थे। वहीं 35 फीसद केस हत्या से। 2024 में 27,593 ने गोली मारकर आत्महत्या की। वहीं 15,364 लोगों की हत्या हुई। 450 लोगों की मौत बंदूक दुर्घटना व अज्ञात कारणों से 404 की जान गई। 636 लोगों ने पुलिस और अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियों की गोली का शिकार बने।

15,364 लोगों की गोली मारकर हत्या

अमेरिका में साल 2024 में हत्या के कुल 20,162 मामले सामने आए। इनमें से करीब 76 फीसद यानी 15,364 लोगों की हत्या गोली मारकर की गई थी। इसी साल करीब 48,824 लोगों ने खुदकुशी की। इनमें से 57 फीसद यानी 27,593 लोगों ने गोली मारकर अपनी जान ली। 

 

कोविड महामारी के वक्त अमेरिका में गोली मारकर हत्या करने के मामलों में इजाफा हुआ था। 2024 में जहां 15,364 लोगों की बंदूक से हत्या की गई। वहीं 2021 में यह आंकड़ा 20,958 तक पहुंच गया था। 

किस राज्य में सबसे अधिक मामले

2024 में बंदूक हिंसा में जान गंवाने वालों की दर मिसिसिपी में सबसे अधिक रही। यहां प्रति 10 हजार लोगों में 28 लोगों की मौत गोली लगने से हुई। इसके बाद न्यू मैक्सिको (26.6), अलास्का (24.4), अलबामा (23.7) और व्योमिंग (23.4) का नंबर आता है। वहीं हवाई (3.7), मैसाचुसेट्स (3.8), न्यू जर्सी (4.0), न्यूयॉर्क (4.4) और रोड आइलैंड (4.6) में सबसे कम दर रिकॉर्ड की गई।

 

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गन हिंसा के पीछे वजह क्या है?

दुनिया में आम नागरिकों के पास सबसे अधिक असलहे अमेरिका में है। 2017 तक दुनियाभर में नागरिक इस्तेमाल के लिए उपलब्ध 857 मिलियन बंदूकों में से करीब 393.3 मिलियन (46%) असलहे अमेरिकी नागरिकों के पास है। अमेरिका के मोंटाना राज्य में प्रतिशत के लिहाज से सबसे अधिक बंदूकें आम जनता के पास हैं। यहां 66.3% लोग बंदूकों के मालिक हैं। माना जाता है कि बंदूकों की अधिक उपलब्धता गन हिंसा के पीछे एक अहम वजह है।

 

मैसाचुसेट्स और न्यू जर्सी में लोगों के पास सबसे कम बंदूक है। यहां 14.7 फीसद लोग अपने पास बंदूक रखते हैं। भारत में जहां हर 100 व्यक्ति में सिर्फ 5.3 लोगों के पास लाइसेंसी बंदूक है तो वहीं अमेरिका में हर 100 व्यक्ति में 120.5 बंदूकें हैं। बंदूक रखने के मामले में अमेरिका के बाद स्विट्जरलैंड का नंबर आता है। यहां हर 100 नागरिक में 27.58 बंदूकें हैं। 

 

 

‘मेरा जीना मुश्किल, बहुत परेशान किया जा रहा’, खुदकुशी करने वाले जज की आखिरी कॉल


दिल्ली के सफदरजंग में कड़कड़डूमा कोर्ट के जज अमन कुमार शर्मा (30) ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। अमन की बहन के ससुर ने हत्या से पहले घर में क्या-क्या हुआ था… उसका विस्तार से खुलासा किया। आत्महत्या के पीछे घरेलू कलह को वजह बताया जा रहा है। शुक्रवार की रात अमन ने अपने पिता को फोन किया था। इसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें दो महीने से परेशान किया जा रहा है। इसी रात उनका पत्नी स्वाति के साथ झगड़ा हुआ। अमन घर में स्वाति की आईएएस बहन निधि मलिक की दखल से परेशान था। निधि मलिक अभी जम्मू-कश्मीर में तैनात हैं। 

 

अमन की बहन के ससुर ने बताया कि मैंने फोन पर बेटे से बात की तो घटना की जानकारी मिली। बेटे ने बताया कि अमन को सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया है। जब तक अस्पताल पहुंचा तब तक डॉक्टर उसे मृत घोषित कर चुके थे। उन्होंने आगे कहा कि घटना के बाद मैंने अपने समधी साहब से बात की। उनकी हालत ठीक नहीं थी। वह बहुत रो रहे थे।

 

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‘मैं बहुत परेशान हूं’

बहन के ससुर ने पुलिस को दिए अमन के पिता के बयान का जिक्र किया और बताया कि रात करीब 10 बजे अमन ने अपने पिता को फोन किया। इसमें अमन ने कहा कि मैं बहुत परेशान हूं। मेरा जीना मुश्किल हो गया है। पिता ने अमन को समझाया और रात 10 बजे ही अलवर से चल पड़े। करीब 12 बजे रात को यहां पहुंचे।

‘पत्नी के साथ अमन का चल रहा था झगड़ा’

बहन के ससुर ने आगे बताया कि यहां पहुंचने पर पिता को पता चला कि उनका (अमन) पत्नी के साथ झगड़ चल रहा है। अमन ने पिता को बताया कि उन्हें दो महीने से बहुत परेशान किया जा रहा है। उन्होंने आगे बताया कि अमन की पत्नी स्वाति भी न्यायिक अधिकारी हैं। उनकी बहन निधि मलिक आईएएस अधिकारी हैं। वह अभी जम्मू में तैनात हैं। अमन के मुताबिक निधि मलिक का घर में बहुत दखल था। यहां का सारा कंट्रोल वही करती है। पिता ने दोनों को समझाने का प्रयास किया।

 

 

 

‘आपको बंद करवा दूंगी’

अमन के पिता ने अपनी बेटी के ससुर को बताया, ‘बहू ने उनसे कहा कि अगर आप यहां से नहीं गए तो वह पुलिस बुला लेगी। आपको बंद करवा दूंगी। हालांकि रात को यहां रुके और सुबह बहू के माता-पिता से संपर्क करने की कोशिश की। मगर उन्होंने उनका फोन ब्लॉक कर दिया। बाद में चाचा से संपर्क किया। वह यहां आए, लेकिन उन्हें कोई मैसेज आया। इसके बाद वह भी चले गए।’ 

 

पिता के बयान के आधार पर अमन की बहन के ससुर ने बताया, ‘स्वाति बहुत गुस्से में थी। अमन रो रहा था। कुछ देर बाद कमरे से आवाज आनी बंद हो गई। उनको लगा कि शायद सुलह समझौता हो गया। मगर कुछ देर बाद पिता ने बहू स्वाति से पूछा कि अमन कहां है तो उन्होंने कहा कि मुझे नहीं मालूम की वह कहां है?’

 

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बाथरूम में लटकी मिली लाश

उन्होंने आगे कहा, ‘बाद में पिता ने अमन के मोबाइल पर फोन किया तो कमरे में बने बाथरूम में घंटी बजी। पिता ने दरवाजा खोलने को कहा। इसी बीच निधि मलिक और चाचा युद्धवीर वहां पहुंचे। दरवाजा खोलने की बहुत कोशिश की गई। मगर नहीं खुला। खिड़की का शीशा तोड़कर जब गार्ड शंकर बाथरूम के अंदर पहुंचा तो देखा अमन ने स्वाति की चुन्नी से फांसी लगा रखी थी। उसे उतारकर अस्पताल ले जाया गया। जहां डॉक्टरों ने अमन को मृत घोषित कर दिया।’ 

पिंक टैक्स क्या है? महिलाओं के सामान अक्सर महंगे क्यों होते हैं


पिंक टैक्स कोई सरकारी टैक्स नहीं है। यह असल में बाजार की एक चालाकी है। इसमें महिलाओं के इस्तेमाल वाली चीजों को पुरुषों की चीजों से महंगा बेचा जाता है। जैसे अगर लड़कों का नीला रेजर 20 रुपये का है तो लड़कियों वाला वही रेजर गुलाबी रंग की पैकिंग में 25 या 30 रुपये का मिलता है। सिर्फ रंग और दिखावट बदलकर महिलाओं से ज्यादा रुपये वसूलना ही ‘पिंक टैक्स’ है। यह कपड़ों, परफ्यूम और यहां तक कि बाल कटवाने जैसी सर्विस पर भी लिया जाता है।

 

इस भेदभाव के बारे में सबसे पहले 1994 में अमेरिका के कैलिफोर्निया में पता चला था। वहां रिसर्च में देखा गया कि महिलाओं के ब्यूटी प्रोडक्ट्स लड़कों के मुकाबले 13 प्रतिशत महंगे थे। ब्रिटेन में तो चेहरे की क्रीम 34 प्रतिशत तक महंगी बेची जा रही थी। इसी भेदभाव को देखते हुए साल 2017 में संयुक्त राष्ट्र (UN) ने पूरी दुनिया को इसे रोकने की सलाह दी थी।

 

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भारत में पिंक टैक्स की स्थिति

भारत में बहुत कम लोगों को इसके बारे में पता है। साल 2018 में जब सरकार ने सैनिटरी पैड्स पर से टैक्स हटाया, तब इस मुद्दे पर थोड़ी चर्चा शुरू हुई। आज भी भारत में महिलाएं जाने-अनजाने में स्किन केयर और सैलून में पुरुषों से ज्यादा रुपये दे रही हैं।

महिलाओं पर इसका असर

पिंक टैक्स महिलाओं के बजट को खराब करता है:

 

कम कमाई और ज्यादा खर्च: महिलाओं की कमाई अक्सर पुरुषों से कम होती है, फिर भी उन्हें सामान महंगा मिलता है।

 

बचत में कमी: फालतू खर्च की वजह से घर की बचत कम हो जाती है।

 

बड़ा आर्थिक नुकसान: अगर पूरी जिंदगी का हिसाब जोड़ें, तो एक महिला सिर्फ इस भेदभाव की वजह से लाखों रुपये फालतू खर्च कर देती है।

इस खर्च से कैसे बचें?

थोड़ी सावधानी से आप अपने रुपये बचा सकती हैं:

 

पुरुषों वाले सामान का इस्तेमाल: अगर रेजर या शैम्पू की क्वालिटी एक जैसी है तो लड़कों वाला पैक खरीदें क्योंकि वह सस्ता होता है।

 

कीमतों को चेक करें: सामान लेने से पहले देखें कि क्या वही चीज लड़कों के लिए कम दाम में मिल रही है।

 

सैलून में बात करें: अगर हेयरकट एक जैसा है तो जेंडर के नाम पर ज्यादा रुपये न दें।

 

जागरूक बनें: सिर्फ उन्हीं कंपनियों से सामान खरीदें जो दाम में भेदभाव नहीं करतीं।

 

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भारत में कानून और नियम

भारत में अभी पिंक टैक्स के खिलाफ कोई सख्त कानून नहीं बना है। हालांकि उपभोक्ता अदालतों का कहना है कि कंपनियों को जेंडर के आधार पर कीमत नहीं बढ़ानी चाहिए। अभी आपकी जानकारी ही आपका सबसे बड़ा बचाव है।