
ज्यादातर लोगों के लिए खरगोश नुकसान न पहुंचाने वाले जानवर होते हैं, जिन्हें बगीचों, पालतू जानवरों और बच्चों की कहानियों से जोड़ा जाता है। बचपन से ही बच्चों को खरगोश की कहानी भी पढ़ाई जाती है और इसे एक प्यारे जानवर के रूप में दिखाया जाता है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया में स्थित मैक्वेरी द्वीप पर खरगोश सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाली बाहरी प्रजातियों में बदल गए। खास बात यह है कि इन खरगोशों को जानबूझकर इस द्वीप पर छोड़ा गया था और अब यह इस पूरे द्वीप के लिए खतरा बन गए। इसके पीछे की कहानी भी बड़ी रोचक है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इन खरगोशों को साल 1878 में जानबूझकर वहां छोड़ा गया था ताकि इस दूरस्थ द्वीप पर आने वाले नाविकों और शिकार करने वालों को खाने का भरोसेमंद साधन मिल सके। यह फैसला उस समय सही लगा और बाद में पर्यावरण के लिए बड़ी तबाही बन गया।
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मैक्वेरी द्वीप पर खरगोश क्यों छोड़े गए?
मैक्वेरी द्वीप ऑस्ट्रेलिया का एक दूरस्थ इलाका है, जो तस्मानिया और अंटार्कटिका के बीच स्थित है। उन्नीसवीं सदी में नाविक और शिकारी अक्सर इस द्वीप पर आते थे और कई दिनों तक वहां रुकते थे। भविष्य में आने वाले लोगों को ताजा मांस मिल सके, इसलिए साल 1878 में वहां जानबूझकर खरगोश छोड़े गए। उस समय यह फैसला समझदारी भरा लगा क्योंकि द्वीप पर आने वाले लोगों के लिए खाने का इंतजाम हो गया था। ऐसी व्यवस्था दूसरी जगहों पर भी अपनाई गई थी, जहां दूरस्थ द्वीपों पर जानवर छोड़कर उन्हें भोजन के भंडार की तरह इस्तेमाल किया जाता था।
तेजी से बढ़ी खरगोशों की संख्या
जिस समय खरगोश छोड़े गए थे उस समय इसके लंबे समय के पर्यावरणीय असर पर बहुत कम ध्यान दिया गया। यह द्वीप का अपना अलग और अनोखा प्राकृतिक तंत्र था, जो लंबे समय तक बाकी दुनिया से अलग विकसित हुआ था। इसलिए यह तेजी से बढ़ने वाले ऐसे जानवरों के आने का सामना करने के लिए तैयार नहीं था। उस द्वीप पर खरगोशों को शिकार करने के लिए छोड़ा गया लेकिन वहां पर खरगोशों की संख्या कंट्रोल करने वाले शिकारी जानवर नहीं थे और खाने के लिए बहुत ज्यादा वनस्पति मौजूद थी।
एक बार जब खरगोश वहां बस गए, तो उनकी संख्या बहुत तेजी से बढ़ने लगी। मादा खरगोश एक साल में कई बार बच्चे पैदा कर सकती है, जिससे अनुकूल परिस्थितियों में उनकी आबादी बहुत तेजी से बढ़ती है। मैक्वेरी द्वीप पर ऐसे कोई स्थानीय शिकारी जानवर नहीं थे जो उनकी संख्या को कंट्रोल कर सकें।
पौधों के लिए बने खतरा
द्वीप पर घनी वनस्पति थी और खरगोशों को खाने के लिए भरपूर भोजन मिल गया। जैसे-जैसे उनकी संख्या हजारों से बढ़कर एक लाख से ज्यादा हो गई, उन्होंने पौधों को उनकी दोबारा बढ़ने की गति से भी ज्यादा तेजी से खाना शुरू कर दिया। जिन इलाकों में पहले घनी हरियाली थी, वे धीरे-धीरे खाली जमीन में बदल गए।
मैक्वेरी द्वीप कई समुद्री पक्षियों के प्रजनन का महत्वपूर्ण स्थान है। यहां कई प्रकार के पक्षी रहते और अंडे देते हैं, जिनमें पेट्रेल, अल्बाट्रॉस और पेंगुइन जैसे पक्षी शामिल हैं। इन पक्षियों में से कई घोंसला बनाने और सुरक्षित रहने के लिए वनस्पति पर निर्भर थे। हालांकि, खरगोशों के कारण वह सब पहले ही खत्म हो चुका था। पौधों की कमी के कारण मिट्टी का कटाव शुरू हो गया जिससे प्रजनन के लिए पक्षियों को सही जगह नहीं मिली। यानी खरगोशों की बढ़ती संख्या ने उन्हें भी नुकसान पहुंचाया।
द्वीप को बचाने के लिए चला अभियान
20वीं सदी के अतं तक लोगों को समझ आ गया कि खरगोशों के कारण द्वीप को नुकसान पहुंच रहा है और इसे बचाने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया ने बाहरी प्रजातियों को हटाने के लिए दुनिया के सबसे बड़े अभियानों में से एक शुरू किया। अभियान के तहत अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल करके खरगोशों और अन्य बाहरी जानवरों को द्वीप से निकाला गया। ऑस्ट्रेलिया को इसके लिए काफी ज्यादा खर्च भी करना पड़ा। साल 2014 तक यह अभियान लगभग पूरा हुआ और द्वीप से खरगोशों को पूरी तरह हटा दिया।
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फिर से द्वीप पर लौटी रौनक
इस अभियान के बाद जो बदलाव दिखाई दिए, उन्होंने वैज्ञानिकों को भी चौंका दिया। स्थानीय पौधे फिर से तेजी से उगने लगे और जिन इलाकों की हरियाली कई दशकों से खत्म हो चुकी थी, वहां दोबारा वनस्पति लौटने लगी। इससे मिट्टी मजबूत हुई और जानवरों के रहने की जगहें फिर से बनने लगीं।
वन्यजीवों को भी इसका फायदा मिला। जैसे-जैसे हरियाली लौटी, समुद्री पक्षियों और दूसरी स्थानीय प्रजातियों के लिए प्रजनन की स्थिति बेहतर होने लगी। कुल मिलाकर द्वीप फिर से अपनी पुरानी स्थिति पर पहुंचने लगा। इस मामले ने पूरी दुनिया को सचेत किया कि कैसे प्रकृति के सात छेड़छाड़ उसे तबाह कर सकती है। मैक्वेरी द्वीप पर एक गलत फैसले से दशकों तक संतुलन बिगड़ता रहा। हालांकि, मैक्वेरी द्वीप पर तो अभियान सफल रहा लेकिन कई जगहों पर आज भी मानवीय गलतियों के कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया है।